Thursday, November 20, 2014

हाथों से कमबख्त  छूटता जरूर है
शीशे का  सामान   टूटता जरूर है

लाख निगाहों से बचाओ इसे मगर
दिल है तो फिर यार लूटता जरूर है
20/11/2014
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Thursday, October 30, 2014

तलब गार  हुआ  दिल,दिदारे माहताब से।
सनम ना भरमाईऐ,फकीरों को शबाब से।
न जानों तुम जानेमन,हमारा हाल है कैसा,,
हमें खुदकी प्यास से,हमें डर है खवाब से।
30/10/2014
1221  1222       122    212  12
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Saturday, October 25, 2014

कुछ लम्हे   लम्हो से   छीनने  पडते हैं।
अंतस के   द्वंद्व सभी   जीतने  पडते हैं।

राब्ता खुदका खुदसे  जानना  है तो फिर,,
खुद के जर्रे  खुद ही   बीनने   पडते हैं।
25/10/2014
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Monday, October 20, 2014

चार दिनों का  खेला जीवन,बचना कांटे बोने से।
खुद भी हँसना औरों को भी, रोको रोने धोने से।

मेरे मन का  यौवन तुझसे,तेरा मुझसे  रोशन है।
प्रीत के फूल  महकें साथी, घरके कोने कोने से।
20/10/2014
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Friday, October 17, 2014

चुपके से दिलमें वो   आया ठहर गया।
पहले बैठा  फिर वो    पूरा पसर गया।

पलकें जरा  बिछाई  तो देखिए  जनाब,,
आँखों के  रास्ते वो   दिल में उतर गया।
17/10/2014
@सुजीत शौकीन

Thursday, October 16, 2014

दिया मुझको   मेरी माँ ने,फलसफा वो   बताता हूँ।
सदाएँ जो   सुनी दिल ने, वही सबको   सुनाता हूँ।

मुझे माँ ने  सिखाया है,बिखरना तो  खुश्बुओं सा,,
बागे ज़िहन   इसलिये ही,  हसीं गुंचे   खिलाता हूँ।
बागे ज़िहन=समझ की बगिया
हसीं गुंचे=सुन्दर कलियाँ
16/10/2014
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Friday, October 10, 2014

दिवाना यार  है ये दिल,, सरे महफिल धडकता है।
धडक जबसे गया जाहिल,,बड़ी मुश्किल संभलता है।

निकम्मा कर रहा हमको,,जाना  इश्क तिरा ऐसे,,
हर आवाज लगे जैसे ,,  तिरा कंगन छनकता है।

10/10/2014
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गुणी मित्रों के सम्मुख मेरा मुक्तक""
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दिवाना यार  है ये दिल,, सरे महफिल, धडकता है।
बहक ऐसा,गया जाहिल,,बड़ी मुश्किल, संभलता है।

निकम्मा कर रहा हमको,,जाना  इश्क सुनों ऐसे,,
तुम्हारी याद  आते ही,, हमारा दिल,  मचलता है।
10/10/2014
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Thursday, October 9, 2014

कभी खुदसे न मिल पाया  दिवाना अज-नबी आया।
सरे महफिल दिखाने ये   अज़ाबे दिल सभी आया।

सुनो यारो सवाले दिल   मलाले दिल रहा ऐसे,,
बहुत था प्यार दिल में पर  जताना ही नही आया।

(बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम)
अज़ाबे दिल=दिल का दर्द

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Tuesday, October 7, 2014

1222    1222    1222    1222
मिरी जाना   तिरे ख्वाबों   कि अब रातें   महकती हैं।
हुई तुमसे     कभी सारी      मुलाकातें     महकती हैं।

मिरे दिलमें     लगे जैसे      तिरी चाहत     बसी ऐसे,,
तिरी यादों   कि ख़ुश्बू से     मिरी साँसे   महकती है।
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Friday, October 3, 2014

सोचते हैं शायद वो बला जला रहे हैं।
देखो कागज के लोग क्या जला रहे हैं।

खुदा परस्त लोग   नजरें चुरा रहे हैं,,
खुशफहम लोग हैं आईना जला रहे हैं।
०३/१०/२०१४
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Tuesday, September 30, 2014

मन तरंग क्या खबर कब उठ जाए।
ख्वाहिशों के नकाब कब हट जाए।

मुझे दम तोडने दे ए मन भीतर तेरे,,
मुझे हवा देके कहीं तू ही भटक जाए।

मुझे निवस्त्र ना कर सरे महफिल तू,,
तेरे दिल की दिख ना तलछट जाए।

मुझे रख मजे ले पर स्वीकार ना कर,,
मेरी नग्नता तेरे गले ना अटक जाए।

मुझे पलने दे"शौकीन"आईने बकते हैं,,
मुझको देखने कौन भीतर तक जाए।

30/09/2014
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Saturday, September 20, 2014

नजरों से यूं,शरारतें भी,करने दे अभी जाना।
प्यार से कुछ,निहारते ही,रहने दे अभी जाना।

तेरे रूप,के दरिया में,नजरों से सफर कर लूं,,
यूं तस्वीर,तेरी दिल में,उतरने दे अभी जाना।

तेरे चेहरे की,रंगीं धूप है,लटों में घर कर लूं,,
इन जुल्फों को,कुछ यूंहीं,बिखरने दे अभी जाना।

मैं तीर कहूं,या शमशीर,जाना तेरी निगाहों को,,
हुक्म-अंदाज़,नजरों को,बहकने दे अभी जाना।

मैं महकता रहूँ,तेरी इन,लरजती सांसों में,,
आह में आह,जरा हमको,भरने दे अभी जाना।

शौकीन'की जान,बेईमान,कातिल भी तुम्हीं हो,,
दिल मजरूह,मेरा है,उबरने दे अभी जाना।

हुक्म-अँदाज=अचूक निशाने वाला/वाली

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Saturday, September 13, 2014

जख्म देने वाले को,तहेदिल चाहता है।
उसी बेदर्दी से,दवा ये दिल चाहता है।

बहलता नही जी,बज्म में भी आकर,,
दिल अब कौनसी,महफिल चाहता है।

सामने है,मयकदा,साकी भी खूब है,,
पर यादें पीना ही,संगदिल चाहता है।

लहरे बहर नहीं,बस रेत है,प्यास है,,
पर रेत में ये दिल,साहिल चाहता है।

दिलपे नाम लिखना,आसान नही होता,,
शिलालेख गढना क्यों,जाहिल चाहता है।

दिल उनका मगर,शायद भरा नहीं,,
मुझसे क्या अब मेरा,कातिल चाहता है।

"शौकीन"चाहता है,सिर्फ खुशी उनकी,,
नाकि पाना वो उनको,हासिल चाहता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित 01/06/2014
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अनछुआ,अहसास ले लो।
धरती सारी,आकाश ले लो।

क्या करुंगा,मैं समंदर,,
मुझसे मेरी,प्यास ले लो।

शब्द शब्द,तेरे लिए है,,
विरह का,उपन्यास ले लो।

कंढी माला,छिनलो सब,,
वापस अब,सन्यास ले लो।

देखो भटके,कृष्ण तुम्हारा,,
राधा बनकर,रास ले लो।

तुम जीत ले लो,हार दे दो,,
लेकिन प्रेम,प्रवाह ले लो।

प्रदिप्त है पर,जल रहा है,,
'शौकीन'का,संताप ले लो।

(17/06/2014)  09811783749
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दिल कोई,दिल के बदले,ले तो सही,,
हार कबूल,पर कोई,खेले तो सही।

आग का दरिया भी, पार कर लूंगा,,
आवाज कोई,उस पार से,दे तो सही।

समेट तो लूँ मैं,कांच के टुकड़े,
तबियत,मेरी कुछ,संभले तो सही।

दिखलाऊँ रानाई तुझे,इश्के शहर की,,
काफिला,तेरा घर से,निकले तो सही।

देख लूँ बहर पे,मैं असर ज्वार का,,
चांद जरा,करवट,बदले तो सही।

कश्ती भी है,मांझी भी,तुफां से डर क्या,,
लहर कोई,साहिल को,चूमे तो सही।

रात क्या,दिन क्या,मुहब्बत के सफर में,,
गले में कोई,हर घड़ी,झूले तो सही।

पत्थर भी,हो गर वो,तो पिघल जाएगा,,
"शौकीन"के,लबों को जरा,छुले तो सही।
बहर=समुन्द्र
रानाई=रफ्तार
साहिल=तट
सर्वाधिकार सुरक्षित 18/05/2014
@सुजीत शौकीन
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हमनें कोई   जब भी    ख़याल रखा है।
कुछ लोगों ने  दिल में   मलाल रखा है।

बस दो घुँट  में कैसे   झूमते हैं लोग,,
और  हमनें   दरिया    खँगाल रखा है।

खुशियां भी  जिन्होंने   छिन ली हमसे,,
हमनें गम  भी उन्हीं   का पाल रखा है।

ईमान जिस्म  के सांचे   मे डाल रखा है।
दो चार को  अब तक   तो टाल रखा है।

पता तो चले   रकीब    कौन है मेरा,,
कई कई को  जानम   सम्भाल रखा है।

बडे मियाँ का   कब्र मे  पांव है लेकिन,,
बासी कढ़ी को फिर भी  उबाल रखा है।

मचा के एक   हरसू    बवाल रखा है।
जब कभी   कलम से  सवाल रखा है।

मुठ्ठीमें लाल  मिर्ची का  गुलाल रखा है।
आपने कैसा  चर चरी   वाल रखा है।

ताप रहे हाथ गर्मा के लव का जिहाद,,
सियासत नें  डर को   उछाल रखा है।

"शौकीन"तंज  बहुत  कसता है तभी,,
घरवालों ने   घर से   निकाल रखा है।

मलाल=रंज,उदासीनता
ख़याल=विचार
हरसू=हर तरफ
जहन=मन
तंज=कटाक्ष
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Saturday, September 6, 2014

DIL SE YAADON KE KANTILE DARAKHT NIKLE



ये गजल आपका स्नेह चाहती है मित्रों
------------------------------
दिलसे यादों के कंटीले   दरख्त निकले।
हर गम पे उनके ही    दस्तख़त  निकले।

निकली आह  बारहा   ज़र्बते उल्फ़त से,,
किताब से मुहब्बत के  जब खत निकले।

कुरेदी  जब  कब्रगाह    हमनें दिल की,,
जितने शव निकले  क्षत-विक्षत निकले।

मुसलसल कलाम से निकली क्यूँ शराब,,
हमनें तो ये चाहा था कि  शरबत निकले।

मुफलिसी में चलो हम कमबख्त निकले,,
रकीब के वास्ते तो अब  मुरव्वत निकले।

जालिम कहीं ले ना ले ईमान''शौकीन"का,,
मौला जान निकले या ये  ग़ुरबत निकले।

दरख़्त=वृक्ष
दस्तख़त=हस्ताक्षर
बारहा=बारबार
ज़र्बत=चोट
उल्फ़त=प्यार
मुसलसल=सिलसिलेवार
मुफलिसी=गरीबी
कमबख्त=अभागा
रकीब=प्रेमिका का प्रेमी
मुरव्वत=लिहाज
ग़ुरबत=दरिद्रता
06/09/2014
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Thursday, August 28, 2014

आने  लगे हैं  बिल,   इजहारे  प्यार के।
हां पूरे  हो गए,   सौ  दिन  सरकार के।
सौ दिन  सरकार के, उम्मीदें  है  भारी।
इच्छा  बस इतनी है,  निर्दोष  हो पारी।
मांगता है "शौकीन",समय अभी थोड़ा।
अभी जो सधा नहीं,प्रशासन का घोड़ा।
28/08/2014
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कलम मौन हों  तो फिर,,शमशीरें  पढनी पडती हैं।
फितरतें  समझने के लिए,, नजीरें पढनी पडती हैं।

अब कौन   गया गुजरा और  निकला कमजर्फ,,
गुहेरा या सांप   रेत पर,,   लकीरें  पढनी पडती हैं।

फेसबुक है ही मगर एक किताब हसीन चेहरों की,,
इसलिए यहाँ शरीफों को,,बेनज़ीरें पढनी पडती है।

गर बहक जाएं गजल शौकीन की तो दोष ना देना,,
उसे  दिन रात गजलोंकी,, तस्वीरें पढनी पडती हैं।

शमशीर=तलवार
कमज़र्फ़=कमीना, ओछा
नजीर=मिसाल, उदाहरण
28/08/2014
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Sunday, July 20, 2014

अहसास को कलम,और दिल को,कागत कर लीजिए।
आसमान को ताकते,किसान की,सोहबत कर लीजिए।
अगर फिर भी,ना मचले,कविता आपके वजूद में,,
आप भी किसी,दिलफरेब से,मौहब्बत कर लीजिए।

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Friday, July 18, 2014

खुश्बुएं हैं हवा में बनके,अर्के गुलाब आई है,,
ऐसे आई तू,महफिल में,जैसे शराब आई है।
तु आई तो,हलचल यूं हूई,मय के दिवानों में,,
मयकशों के लिए मयकदा,जैसे साथ लाई है।

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Saturday, July 12, 2014

खंडहरों की,नींव से जब,रोडे निकलते हैं।
जो ईंट ऊठाओ वहीं पे,मकोडे निकलते हैं।

गिरा देती है,हाय कभी,बुलंद मकान को,,
तोड़ने वाली,नजरों से,हथौड़े निकलते हैं।

अब क्या कीजिएगा,इस देहाती जबां का,,
जो शेर भी कहें,तो मुँह से,घोडे निकलते हैं।

मीठी जबां वालों से,परहेज़ ही मुनासिब,,
ज्यादा आम,खाने से भी तो,फोड़े निकलते हैं।

बैठकर जडों में ही,काटते हैं लोग जड़ें,,
काटते गला वही जो,हाथ जोडे निकलते हैं।

देते भी हैं,दुहाई बहुत,नारी उत्थान की,,
ऐसे लोग ही,घरवाली को,छोडे निकलते हैं।

ज्यादातर,पाप से रिश्ता,जोड़े निकलते है,,
होटलों से,जितने हंसों के,जोडे निकलते हैं।

खाल शेर की,जब सियार,ओढ़े निकलते हैं,,
''
शौकीन''की,कलम से तब,कोडे निकलते हैं।

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Wednesday, July 9, 2014

मचलती हैं,आहें जब,,तू राहों से निकलती है।
तुम्हें देखके,वाह वाह,,निगाहों से निकलती है।

शहर हसीन,है तो फिर,,डर बंदूक का कैसा,,
बचना उन,गोलियों से जो,,आंखों से निकलती है।
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Wednesday, July 2, 2014

कोई अनकहा सा,फलसफा हूँ मैं,,


कोई अनकहा सा,फलसफा हूँ मैं,,
शायद इसलिए,सबसे जुदा हूँ मैं।

"
शौकीन"हूँ,नजर का,चश्मा हूँ मैं,,
पर लोगों को फिक्र है के क्या हूँ मैं।

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Monday, June 23, 2014



हरबार दर्द का,आगाज ढूँढते हैं,,
हमजो आशिकी का,ताज ढूँढते हैं।

शायद जिन्दा हो मौहब्बत अभी,,
हम कब्र में,मुमताज ढूँढते हैं।

मरने को उम्र काफी थी अभी,,
रोग मगर,लाईलाज ढूँढते हैं।

करके प्रीत यहाँ,हो पाया शुकून,,
हम ऐसा कोई,जांबाज ढूँढते हैं।

सरकते पल्लू हमको भी भाते हैं,,
पर जिस्म नहीं,जज्बात ढूँढते हैं।

पत्थर मारे गए,दिवानों को सदा,,
वो पत्थरों में,पुखराज ढूंढते हैं।

पत्थरों से दिल,लगा के बुतकार,,
बुत में वो कैसी,आवाज ढूँढते हैं।

पंख नही पर,हौंसलें जो बुलंद हैं,,
तुफानों में भी,परवाज ढूँढते हैं।

शौकीन तो कहता है दिल की लगी,
लोग पर दर्द में भी,राज ढूँढते हैं।

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