Saturday, September 13, 2014

जख्म देने वाले को,तहेदिल चाहता है।
उसी बेदर्दी से,दवा ये दिल चाहता है।

बहलता नही जी,बज्म में भी आकर,,
दिल अब कौनसी,महफिल चाहता है।

सामने है,मयकदा,साकी भी खूब है,,
पर यादें पीना ही,संगदिल चाहता है।

लहरे बहर नहीं,बस रेत है,प्यास है,,
पर रेत में ये दिल,साहिल चाहता है।

दिलपे नाम लिखना,आसान नही होता,,
शिलालेख गढना क्यों,जाहिल चाहता है।

दिल उनका मगर,शायद भरा नहीं,,
मुझसे क्या अब मेरा,कातिल चाहता है।

"शौकीन"चाहता है,सिर्फ खुशी उनकी,,
नाकि पाना वो उनको,हासिल चाहता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित 01/06/2014
@सुजीत शौकीन
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