Saturday, September 6, 2014

DIL SE YAADON KE KANTILE DARAKHT NIKLE



ये गजल आपका स्नेह चाहती है मित्रों
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दिलसे यादों के कंटीले   दरख्त निकले।
हर गम पे उनके ही    दस्तख़त  निकले।

निकली आह  बारहा   ज़र्बते उल्फ़त से,,
किताब से मुहब्बत के  जब खत निकले।

कुरेदी  जब  कब्रगाह    हमनें दिल की,,
जितने शव निकले  क्षत-विक्षत निकले।

मुसलसल कलाम से निकली क्यूँ शराब,,
हमनें तो ये चाहा था कि  शरबत निकले।

मुफलिसी में चलो हम कमबख्त निकले,,
रकीब के वास्ते तो अब  मुरव्वत निकले।

जालिम कहीं ले ना ले ईमान''शौकीन"का,,
मौला जान निकले या ये  ग़ुरबत निकले।

दरख़्त=वृक्ष
दस्तख़त=हस्ताक्षर
बारहा=बारबार
ज़र्बत=चोट
उल्फ़त=प्यार
मुसलसल=सिलसिलेवार
मुफलिसी=गरीबी
कमबख्त=अभागा
रकीब=प्रेमिका का प्रेमी
मुरव्वत=लिहाज
ग़ुरबत=दरिद्रता
06/09/2014
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुजीत शौकीन
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