Saturday, September 13, 2014

दिल कोई,दिल के बदले,ले तो सही,,
हार कबूल,पर कोई,खेले तो सही।

आग का दरिया भी, पार कर लूंगा,,
आवाज कोई,उस पार से,दे तो सही।

समेट तो लूँ मैं,कांच के टुकड़े,
तबियत,मेरी कुछ,संभले तो सही।

दिखलाऊँ रानाई तुझे,इश्के शहर की,,
काफिला,तेरा घर से,निकले तो सही।

देख लूँ बहर पे,मैं असर ज्वार का,,
चांद जरा,करवट,बदले तो सही।

कश्ती भी है,मांझी भी,तुफां से डर क्या,,
लहर कोई,साहिल को,चूमे तो सही।

रात क्या,दिन क्या,मुहब्बत के सफर में,,
गले में कोई,हर घड़ी,झूले तो सही।

पत्थर भी,हो गर वो,तो पिघल जाएगा,,
"शौकीन"के,लबों को जरा,छुले तो सही।
बहर=समुन्द्र
रानाई=रफ्तार
साहिल=तट
सर्वाधिकार सुरक्षित 18/05/2014
@सुजीत शौकीन
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