Saturday, July 12, 2014

खंडहरों की,नींव से जब,रोडे निकलते हैं।
जो ईंट ऊठाओ वहीं पे,मकोडे निकलते हैं।

गिरा देती है,हाय कभी,बुलंद मकान को,,
तोड़ने वाली,नजरों से,हथौड़े निकलते हैं।

अब क्या कीजिएगा,इस देहाती जबां का,,
जो शेर भी कहें,तो मुँह से,घोडे निकलते हैं।

मीठी जबां वालों से,परहेज़ ही मुनासिब,,
ज्यादा आम,खाने से भी तो,फोड़े निकलते हैं।

बैठकर जडों में ही,काटते हैं लोग जड़ें,,
काटते गला वही जो,हाथ जोडे निकलते हैं।

देते भी हैं,दुहाई बहुत,नारी उत्थान की,,
ऐसे लोग ही,घरवाली को,छोडे निकलते हैं।

ज्यादातर,पाप से रिश्ता,जोड़े निकलते है,,
होटलों से,जितने हंसों के,जोडे निकलते हैं।

खाल शेर की,जब सियार,ओढ़े निकलते हैं,,
''
शौकीन''की,कलम से तब,कोडे निकलते हैं।

सर्वाधिकार सुरक्षित@सुजीत शौकीन
ब्लाग: http://sujeetshokeen.blogspot.in
ब्लाग :   http://gazal-e-shokeen.blogspot.in
फेसबुक: https://www.facebook.com/sujeet.shokeen
मेरा पेज: https://www.facebook.com/pages/Kavi-Sujeet-Shokeen/253451778196049

 

No comments:

Post a Comment