Tuesday, September 30, 2014

मन तरंग क्या खबर कब उठ जाए।
ख्वाहिशों के नकाब कब हट जाए।

मुझे दम तोडने दे ए मन भीतर तेरे,,
मुझे हवा देके कहीं तू ही भटक जाए।

मुझे निवस्त्र ना कर सरे महफिल तू,,
तेरे दिल की दिख ना तलछट जाए।

मुझे रख मजे ले पर स्वीकार ना कर,,
मेरी नग्नता तेरे गले ना अटक जाए।

मुझे पलने दे"शौकीन"आईने बकते हैं,,
मुझको देखने कौन भीतर तक जाए।

30/09/2014
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Saturday, September 20, 2014

नजरों से यूं,शरारतें भी,करने दे अभी जाना।
प्यार से कुछ,निहारते ही,रहने दे अभी जाना।

तेरे रूप,के दरिया में,नजरों से सफर कर लूं,,
यूं तस्वीर,तेरी दिल में,उतरने दे अभी जाना।

तेरे चेहरे की,रंगीं धूप है,लटों में घर कर लूं,,
इन जुल्फों को,कुछ यूंहीं,बिखरने दे अभी जाना।

मैं तीर कहूं,या शमशीर,जाना तेरी निगाहों को,,
हुक्म-अंदाज़,नजरों को,बहकने दे अभी जाना।

मैं महकता रहूँ,तेरी इन,लरजती सांसों में,,
आह में आह,जरा हमको,भरने दे अभी जाना।

शौकीन'की जान,बेईमान,कातिल भी तुम्हीं हो,,
दिल मजरूह,मेरा है,उबरने दे अभी जाना।

हुक्म-अँदाज=अचूक निशाने वाला/वाली

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Saturday, September 13, 2014

जख्म देने वाले को,तहेदिल चाहता है।
उसी बेदर्दी से,दवा ये दिल चाहता है।

बहलता नही जी,बज्म में भी आकर,,
दिल अब कौनसी,महफिल चाहता है।

सामने है,मयकदा,साकी भी खूब है,,
पर यादें पीना ही,संगदिल चाहता है।

लहरे बहर नहीं,बस रेत है,प्यास है,,
पर रेत में ये दिल,साहिल चाहता है।

दिलपे नाम लिखना,आसान नही होता,,
शिलालेख गढना क्यों,जाहिल चाहता है।

दिल उनका मगर,शायद भरा नहीं,,
मुझसे क्या अब मेरा,कातिल चाहता है।

"शौकीन"चाहता है,सिर्फ खुशी उनकी,,
नाकि पाना वो उनको,हासिल चाहता है।

सर्वाधिकार सुरक्षित 01/06/2014
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अनछुआ,अहसास ले लो।
धरती सारी,आकाश ले लो।

क्या करुंगा,मैं समंदर,,
मुझसे मेरी,प्यास ले लो।

शब्द शब्द,तेरे लिए है,,
विरह का,उपन्यास ले लो।

कंढी माला,छिनलो सब,,
वापस अब,सन्यास ले लो।

देखो भटके,कृष्ण तुम्हारा,,
राधा बनकर,रास ले लो।

तुम जीत ले लो,हार दे दो,,
लेकिन प्रेम,प्रवाह ले लो।

प्रदिप्त है पर,जल रहा है,,
'शौकीन'का,संताप ले लो।

(17/06/2014)  09811783749
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दिल कोई,दिल के बदले,ले तो सही,,
हार कबूल,पर कोई,खेले तो सही।

आग का दरिया भी, पार कर लूंगा,,
आवाज कोई,उस पार से,दे तो सही।

समेट तो लूँ मैं,कांच के टुकड़े,
तबियत,मेरी कुछ,संभले तो सही।

दिखलाऊँ रानाई तुझे,इश्के शहर की,,
काफिला,तेरा घर से,निकले तो सही।

देख लूँ बहर पे,मैं असर ज्वार का,,
चांद जरा,करवट,बदले तो सही।

कश्ती भी है,मांझी भी,तुफां से डर क्या,,
लहर कोई,साहिल को,चूमे तो सही।

रात क्या,दिन क्या,मुहब्बत के सफर में,,
गले में कोई,हर घड़ी,झूले तो सही।

पत्थर भी,हो गर वो,तो पिघल जाएगा,,
"शौकीन"के,लबों को जरा,छुले तो सही।
बहर=समुन्द्र
रानाई=रफ्तार
साहिल=तट
सर्वाधिकार सुरक्षित 18/05/2014
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हमनें कोई   जब भी    ख़याल रखा है।
कुछ लोगों ने  दिल में   मलाल रखा है।

बस दो घुँट  में कैसे   झूमते हैं लोग,,
और  हमनें   दरिया    खँगाल रखा है।

खुशियां भी  जिन्होंने   छिन ली हमसे,,
हमनें गम  भी उन्हीं   का पाल रखा है।

ईमान जिस्म  के सांचे   मे डाल रखा है।
दो चार को  अब तक   तो टाल रखा है।

पता तो चले   रकीब    कौन है मेरा,,
कई कई को  जानम   सम्भाल रखा है।

बडे मियाँ का   कब्र मे  पांव है लेकिन,,
बासी कढ़ी को फिर भी  उबाल रखा है।

मचा के एक   हरसू    बवाल रखा है।
जब कभी   कलम से  सवाल रखा है।

मुठ्ठीमें लाल  मिर्ची का  गुलाल रखा है।
आपने कैसा  चर चरी   वाल रखा है।

ताप रहे हाथ गर्मा के लव का जिहाद,,
सियासत नें  डर को   उछाल रखा है।

"शौकीन"तंज  बहुत  कसता है तभी,,
घरवालों ने   घर से   निकाल रखा है।

मलाल=रंज,उदासीनता
ख़याल=विचार
हरसू=हर तरफ
जहन=मन
तंज=कटाक्ष
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Saturday, September 6, 2014

DIL SE YAADON KE KANTILE DARAKHT NIKLE



ये गजल आपका स्नेह चाहती है मित्रों
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दिलसे यादों के कंटीले   दरख्त निकले।
हर गम पे उनके ही    दस्तख़त  निकले।

निकली आह  बारहा   ज़र्बते उल्फ़त से,,
किताब से मुहब्बत के  जब खत निकले।

कुरेदी  जब  कब्रगाह    हमनें दिल की,,
जितने शव निकले  क्षत-विक्षत निकले।

मुसलसल कलाम से निकली क्यूँ शराब,,
हमनें तो ये चाहा था कि  शरबत निकले।

मुफलिसी में चलो हम कमबख्त निकले,,
रकीब के वास्ते तो अब  मुरव्वत निकले।

जालिम कहीं ले ना ले ईमान''शौकीन"का,,
मौला जान निकले या ये  ग़ुरबत निकले।

दरख़्त=वृक्ष
दस्तख़त=हस्ताक्षर
बारहा=बारबार
ज़र्बत=चोट
उल्फ़त=प्यार
मुसलसल=सिलसिलेवार
मुफलिसी=गरीबी
कमबख्त=अभागा
रकीब=प्रेमिका का प्रेमी
मुरव्वत=लिहाज
ग़ुरबत=दरिद्रता
06/09/2014
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