Tuesday, October 9, 2018

रगों में शीर: बनके बहता है जो ख़ून-ए-दिल शौक़ीन
गर आँखों से निचोड़ा जाए तो मीठा नहीं रहता

رگوں میں شیرہ بنکر بہتا ہے جو خون-دل شوقین
گر آنکھوں سے نچوڑا جائے تو میٹھا نہیں رہتا
© سُجیت شوقین

सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐 09/10/2018
रचनाकार © कवि सुजीत शौक़ीन





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