Wednesday, January 11, 2017

अपनी धुन में रहती है,
किसी से कुछ नहीं कहती।
रुकावटों की अनदेखी करती हुई,
बस बहती है, जहाँ से राह मिले,
दंभ के पर्वतों को एक तरफ छोडते हुए।

हाँ वो तरल है,
टकराव नहीं चाहती।
उसे डर है,तरलता चली न जाए उसकी।
घमंड से टकराव,अच्छा नहीं होता न।

मगर तोड़ देती है अहंकार पर्वत का,
जब कोई रास्ता नहीं बचता।
चीर कर गर्व के सीने को,
बना लेती है रस्ता।

लोगो रस्ता देते रहना उसे,
वो नदी है,
तरलता ही शक्ति है उसकी ❗

सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐12/01/2017
 रचनाकार @    कवि सुजीत शौकीन
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