Thursday, April 23, 2015

खबर अखबार की बनता रहा हूँ
सियासत का सदा  मुद्दा  रहा हूँ

मैं जिन्दा ही कहाँ था जो मरूँगा
मैं अड़सठ साल से मुर्दा रहा हूँ

लदे जिस शाख़ पर उल्लू रहे हैं
पुरानी लाश अब लटका रहा हूँ

सदा  झेले  हैं  तूफां  बाढ़ सूखा
कोई  मौसम रहा  मरता रहा हूँ

ये कैसा भाग्य मैं चुनता रहा हूँ
जहाँ मैं सिर्फ इक  चर्चा रहा हूँ

इसे हत्या कहो या खुदकुशी अब
सफर  पूरा  हुआ मैं जा रहा हूँ

दिखाने को सभीको फिर से गुस्सा
मैं जल्दी भूत बनकर आ रहा हूँ

जो दो सौ थे हुए शौक़ीन चालीस
नया नम्बर तुम्हें समझा रहा हूँ

(23/04/2015)सर्वाधिकार सुरक्षित
  रचनाकार  @   कवि सुजीत शौकीन
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