खबर अखबार की बनता रहा हूँ
सियासत का सदा मुद्दा रहा हूँ
मैं जिन्दा ही कहाँ था जो मरूँगा
मैं अड़सठ साल से मुर्दा रहा हूँ
लदे जिस शाख़ पर उल्लू रहे हैं
पुरानी लाश अब लटका रहा हूँ
सदा झेले हैं तूफां बाढ़ सूखा
कोई मौसम रहा मरता रहा हूँ
ये कैसा भाग्य मैं चुनता रहा हूँ
जहाँ मैं सिर्फ इक चर्चा रहा हूँ
इसे हत्या कहो या खुदकुशी अब
सफर पूरा हुआ मैं जा रहा हूँ
दिखाने को सभीको फिर से गुस्सा
मैं जल्दी भूत बनकर आ रहा हूँ
जो दो सौ थे हुए शौक़ीन चालीस
नया नम्बर तुम्हें समझा रहा हूँ
(23/04/2015)सर्वाधिकार सुरक्षित
रचनाकार @ कवि सुजीत शौकीन
09811783749
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सियासत का सदा मुद्दा रहा हूँ
मैं जिन्दा ही कहाँ था जो मरूँगा
मैं अड़सठ साल से मुर्दा रहा हूँ
लदे जिस शाख़ पर उल्लू रहे हैं
पुरानी लाश अब लटका रहा हूँ
सदा झेले हैं तूफां बाढ़ सूखा
कोई मौसम रहा मरता रहा हूँ
ये कैसा भाग्य मैं चुनता रहा हूँ
जहाँ मैं सिर्फ इक चर्चा रहा हूँ
इसे हत्या कहो या खुदकुशी अब
सफर पूरा हुआ मैं जा रहा हूँ
दिखाने को सभीको फिर से गुस्सा
मैं जल्दी भूत बनकर आ रहा हूँ
जो दो सौ थे हुए शौक़ीन चालीस
नया नम्बर तुम्हें समझा रहा हूँ
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