Sunday, July 20, 2014

अहसास को कलम,और दिल को,कागत कर लीजिए।
आसमान को ताकते,किसान की,सोहबत कर लीजिए।
अगर फिर भी,ना मचले,कविता आपके वजूद में,,
आप भी किसी,दिलफरेब से,मौहब्बत कर लीजिए।

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Friday, July 18, 2014

खुश्बुएं हैं हवा में बनके,अर्के गुलाब आई है,,
ऐसे आई तू,महफिल में,जैसे शराब आई है।
तु आई तो,हलचल यूं हूई,मय के दिवानों में,,
मयकशों के लिए मयकदा,जैसे साथ लाई है।

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Saturday, July 12, 2014

खंडहरों की,नींव से जब,रोडे निकलते हैं।
जो ईंट ऊठाओ वहीं पे,मकोडे निकलते हैं।

गिरा देती है,हाय कभी,बुलंद मकान को,,
तोड़ने वाली,नजरों से,हथौड़े निकलते हैं।

अब क्या कीजिएगा,इस देहाती जबां का,,
जो शेर भी कहें,तो मुँह से,घोडे निकलते हैं।

मीठी जबां वालों से,परहेज़ ही मुनासिब,,
ज्यादा आम,खाने से भी तो,फोड़े निकलते हैं।

बैठकर जडों में ही,काटते हैं लोग जड़ें,,
काटते गला वही जो,हाथ जोडे निकलते हैं।

देते भी हैं,दुहाई बहुत,नारी उत्थान की,,
ऐसे लोग ही,घरवाली को,छोडे निकलते हैं।

ज्यादातर,पाप से रिश्ता,जोड़े निकलते है,,
होटलों से,जितने हंसों के,जोडे निकलते हैं।

खाल शेर की,जब सियार,ओढ़े निकलते हैं,,
''
शौकीन''की,कलम से तब,कोडे निकलते हैं।

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Wednesday, July 9, 2014

मचलती हैं,आहें जब,,तू राहों से निकलती है।
तुम्हें देखके,वाह वाह,,निगाहों से निकलती है।

शहर हसीन,है तो फिर,,डर बंदूक का कैसा,,
बचना उन,गोलियों से जो,,आंखों से निकलती है।
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Wednesday, July 2, 2014

कोई अनकहा सा,फलसफा हूँ मैं,,


कोई अनकहा सा,फलसफा हूँ मैं,,
शायद इसलिए,सबसे जुदा हूँ मैं।

"
शौकीन"हूँ,नजर का,चश्मा हूँ मैं,,
पर लोगों को फिक्र है के क्या हूँ मैं।

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