Sunday, April 28, 2019

ख़िजाँ की शाख़ पे कोई समर नहीं आता
उजाला ज़ात के अंधों के घर नहीं आता
मुसाफ़िरों से कहो सुब्ह तक क़याम करें
अँधेरी रात में रस्ता नज़र नहीं आता
©सुजीत शौक़ीन
 خزاں کی شاخ پہ کوئی ثمر نہیں آتا
 اُجالا زات کے اندھوں کے گھر نہیں آیا
 مسافروں سے کہو صبح تک قیام کریں
 اندھیری رات میں رستہ نظر نہیں آتا
©سُجیت شوقین
सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐 28/04/2019
रचनाकार © कवि सुजीत शौक़ीन 

Thursday, April 25, 2019

वो जानते ही कितना हैं मुझको ए दोस्तो
जो जानते हैं मुझ को मुलाक़ात के बग़ैर
कुछ लोग मेरे साएबाँ में ऐसे हैं जिन्हें
साया तो मेरा चाहिए लेकिन मेरे बग़ैर
وہ جانتے ہی کتنا ہیں مجھکو اے دوستو
 جو جانتے ہیں مجھکو ملاقات کے بغیر
کچھ لوگ میرے سائباں میں ایسے ہیں جنہیں
سایہ تو میرا چاہیے لیکن میرے بغیر ©سُجیت شوقین
सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐25/04/2019
रचनाकार © कवि सुजीत शौक़ीन