Thursday, August 28, 2014

आने  लगे हैं  बिल,   इजहारे  प्यार के।
हां पूरे  हो गए,   सौ  दिन  सरकार के।
सौ दिन  सरकार के, उम्मीदें  है  भारी।
इच्छा  बस इतनी है,  निर्दोष  हो पारी।
मांगता है "शौकीन",समय अभी थोड़ा।
अभी जो सधा नहीं,प्रशासन का घोड़ा।
28/08/2014
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुजीत शौकीन
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कलम मौन हों  तो फिर,,शमशीरें  पढनी पडती हैं।
फितरतें  समझने के लिए,, नजीरें पढनी पडती हैं।

अब कौन   गया गुजरा और  निकला कमजर्फ,,
गुहेरा या सांप   रेत पर,,   लकीरें  पढनी पडती हैं।

फेसबुक है ही मगर एक किताब हसीन चेहरों की,,
इसलिए यहाँ शरीफों को,,बेनज़ीरें पढनी पडती है।

गर बहक जाएं गजल शौकीन की तो दोष ना देना,,
उसे  दिन रात गजलोंकी,, तस्वीरें पढनी पडती हैं।

शमशीर=तलवार
कमज़र्फ़=कमीना, ओछा
नजीर=मिसाल, उदाहरण
28/08/2014
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